लेखक: सैयद आमिर रज़ा ज़ैदी फंदेड़वी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी इंसानियत का उसूल यह है कि नेकी का बदला नेकी से दिया जाए। जो व्यक्ति अपनी क़ौम, अपने इलाके ,अपनी बिरादरी या इंसानियत के लिए कोई क़ीमती सेवा करता है, वह ज़रूर सराहना और धन्यवाद का हकदार होता है।
मौलाना रज़ी हैदर ज़ैदी ने “तारीख़ फंदेड़ी सादात” जैसी अहम किताब तैयार करके न सिर्फ अपनी इल्मी समझ का सबूत दिया है, बल्कि पूरी बस्ती को एक बड़ा और अनमोल तोहफा दिया है।
इस तोहफ़े की अहमियत मुझे यह एहसास कराती है कि मैं बस्ती की तरफ से उनकी इस बड़ी सेवा को अख़बार के ज़रिए लोगों तक पहुँचाऊँ, ताकि उनकी मेहनत और काम से लोग वाक़िफ़ हो सकें।
इस क़ीमती किताब के प्रकाशित होने पर मैं दिल की गहराइयों से मौलाना सैयद रज़ी हैदर ज़ैदी और अपनी बस्ती के तमाम सम्मानित लोगों को मुबारकबाद पेश करता हूँ।

मौलाना सैयद रज़ी हैदर ज़ैदी की जीवनी
मौलाना सैयद रज़ी हैदर ज़ैदी का जन्म सन 1980 ईस्वी (1400 हिजरी) में फंदेड़ी सादात, ज़िला अमरोहा, उत्तर प्रदेश में हुआ। आपने शुरुआती पढ़ाई अपने गाँव के “किसान जूनियर हाई स्कूल फंदेड़ी सादात” से की। सन् 1995 में आपने लखनऊ का रुख किया और वहाँ एक साथ दीनी (इस्लामी) और आधुनिक तालीम जारी रखी।
आपने कई डिग्रियाँ और सर्टिफिकेट हासिल किए, जिनमें शामिल हैं:
अदीब,अदीब माहिर,अदीब कामिल, मोअल्लिम, जामिया उर्दू अलीगढ़,मुनशी,मौलवी,आलिम,कामिल और फ़ाज़िल (अरबी–फ़ारसी), यूपी बोर्ड,इमाद–उल–तफ़सीर,इमाद–उल–अदब, शिया कॉलेज नख्खास,B.A. (बी.ए.) — शिया डिग्री कॉलेज लखनऊ,M.A. (एम.ए.) — जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली
सन् 2003 में आपने उच्च शिक्षा के लिए “क़ुम, ईरान” का सफ़र किया।
क़ुम में आपने हज़रत मासूमा (स) के हरम, मदरसा फ़ैज़िया, मदरसा रसूल-ए-आज़म, मदरसा महदी, मदरसा फ़िक़्ह व उसूल (जामिअत अल-उलूम) और मदरसा हुज्जतिया में बेहतरीन उस्तादों से इल्म हासिल किया।
आपने हरम-ए- मासूमा (स) में कई छात्रों को, फ़िक़्ह, मन्तिक़ और उसूल की तालीम दी। क़ुम में रहने के दौरान आपने फ़ारसी भाषा में फ़िक़्ही किताबें और कई अहम मक़ाले लिखे। उर्दू और फ़ारसी में आपकी केइ किताबें और सेंकड़ों तक़रीज़े और लेख लिखे जो विभिन्न संस्थानों से प्रकाशित होते रहते हैं।
आप 20 जनवरी 2006 को शादी के बंधन में बंधे। जिस साल आप ईरान गए, उसी साल आपने ईरान से पैदल इराक़ की ज़ियारत की और कर्बला, नजफ़, सामरा और काज़मैन की पवित्र दरगाहों पर हाज़िरी दी। इसके बाद भी आप चार बार ज़ियारत के लिए गए।
सन् 2017 में आप अपने माता–पिता से मिलने भारत आए। वापस ईरान जाने वाले दिन ही ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली को आपकी मौजूदगी की जानकारी मिली और उन्होंने आपको इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म सेंटर आने का निमंत्रण दिया।
वहाँ के ज़िम्मेदारों ने कहा कि आप यहाँ रहें, ताकि रिसर्च के काम में आपकी मदद से बेहतरी हो सके। आपने पहले कहा कि आज रात आपकी फ्लाइट है, लेकिन बहुत आग्रह के बाद तीन महीने रुकने के लिए तैयार हुए—और उसी रुकने का सिलसिला आज तक चलता आ रहा है।
आपका ज़ाकरी (मजलिस पढ़ने) का अंदाज़ बहुत प्रभावशाली और विश्लेषणात्मक है।इसी लिए आपको अहल-ए-इल्म अफराद दावत देते रहते हैं।आपने इस राह में कई यात्राएँ की हैं और अभी भी सिलसिला जारी है। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद आप लोगों की समस्याओं पर नज़र रखते हैं और उनके हल की कोशिश करते रहते हैं। आपने “विन चैनल” पर “दीन और रोज़गार” के विषय पर महत्वपूर्ण भाषण दिए, ताकि लोगों को जीवन की समस्याओं का समाधान मिल सके।
मौलाना “इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम चैरिटेबल फ़ाउंडेशन, टालकटोरा लखनऊ” के भी सदस्य हैं।यह संस्था बिना किसी चंदे या मदद के मेडिकल, शिक्षा, और सामाजिक सेवाएँ करती है।
इस समय आप “इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म सेंटर (ईरान कल्चर हाउस)” दिल्ली में रिसर्च का काम कर रहे हैं।
आपको व्यापार (बिज़नेस) की भी अच्छी समझ थी और आप एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला चुके हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार किया।
लेकिन अब आप पूरी तरह से इल्मी और फ़लाही कामों में लगे हुए हैं।
मौलाना “A.M.R. मेडिकल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट, दिल्ली” के प्रमुख भी हैं।
यह ट्रस्ट ज़रूरतमंद मरीज़ों की सहायता करता है, जगह-जगह मेडिकल कैंप लगाता है और मरीज़ों का इलाज अस्पतालों में कराता है।पूरे देश में इस ट्रस्ट से सैकड़ों डॉक्टर और अस्पताल जुड़े हैं और अपनी जिम्मेदारी अच्छे तरीके से निभा रहे हैं।
अंत में हमारी दुआ है कि ख़ुदा उनकी उम्र और तौफ़ीक़ो में इज़ाफ़ा करे। आमीन।
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